Friday, August 10, 2012

अब तो रातों में भी आहट से  चौंक जाता हूं  !
अन्ना , अरविन्द  नाम से बौखला जाता हूँ !!
फिर सोचने लगता हूँ अपनी ही धुन में..
सिंह होकर भी कहाँ सियारों में फंस गया ?
बापू  नाम मक्कारी से लेने वालों में बस गया :(
था मै गुरु - ग्यानी अब बस "मुकादम" हूँ,
गाता भी हूँ  भैरव तो बस भैरवी सी लगती है ,
पता नहीं क्या चीज़ गले में आकर अटकती है ?

07/08/2012

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