Thursday, July 23, 2009

भटकते रहो दर बदर अब

भटकते रहो दर बदर अब
यंही सजा है तुम्हारी
नींद के भी होश है बेखबर
यंही सजा है तुम्हारी
दरो के आड़ से देखेंगे सब तुम्हे
हंसी की आड़ से देखेंगे सब तुम्हे
छीन जायेंगे होश तुम्हारे
तब संभालेगा न कोई तुम्हे
भीड़ से अलग चले थे ?
यही अदा है तुम्हारी !
भटकते रहो दर बदर ............................
झुंड से अलग हो क्यूँ ?
भीड़ मे अकेले क्यूँ ?
राह मे नवेले क्यूँ ?
ढर्रे पे चलना ही रीत है हमारी
भटकते रहो दर बदर .............................
रुकी सी हवा मुक्ति जयघोष मे
सुगंध को व्याकुल फूल
भूक से न बिलखते शिशु अब
बस्तियां निर्विकार
स्तब्ध रास्ते
सोयी इच्छाएं आस्ते आस्ते
बलंदी की सोच से शर्माता गिरी
खाई की शरण मे
फिर अतर्क्य कोलाहल
ऊपर चढ़ चले थे ?
राह गलत थी तुम्हारी
भटकते रहो दर बदर .....................
कोलाहल मे डुबो
अपने आप को भूलो
भीड़ मे तुम हो लो
फिर कुछ सजा कम हो तुम्हारी
न भटको तुम इधर उधर
जगह यहाँ है तुम्हारी...........................
२३.०७.२००९
शैलेश पुरोहित
कीएव , उक्रेन

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