Friday, October 30, 2009

चाहा था विचारों को बाँध सीमा मे
बंधक बना ले अपना
किंतु यह तो लगता है
अब निरर्थक सपना
सपने तो यादों की कच्ची
डोर से बंधे होते हैं
अचानक किसी स्पर्श से ..
बिखर जाते हैं

बिखरना तो जिंदगी की रीत है
और इसीलिए तो हमने भी
बिखराई प्रीत है
प्रीत एक सांचा है
प्रेम एक ढांचा है
यादों का चैतन्य ,
भावनाओं का समर्पण है

समर्पण मे छुपा अनुराग है
अनुराग ही तो स्नेह है
स्नेह का रूप ममता है
ममता के आगे सब बेबस हें


दीपो के त्यौहार मे हर्ष अपरंपार हो
मिठाई के स्वाद साथ प्रेम , मित्र , परिवार हो
फूलोंकी महक से घर आँगन सराबोर हो
मंगल कामना विश्व कल्याण से ह्रदय आत्मविभोर हो
मिले सफलता हर कार्य मे यही आत्मबल हो
मिटे अँधेरा ,अंहकार , मद यही मंगलाचरण हो
एक दिया ह्रदय मे भी निरपेक्ष भक्ति का प्रकाशित हो
मांगे यहीं हम , हर पल खुशी आपकी वृद्धिंगत हो

-शैलेश
१७/१०/२००९

Sunday, October 11, 2009

ये शाम बिताती है
बढ़ता अँधेरा
तनहाइयों की लकीरें और चौडी कर देता है
बढ़ता अँधेरा
स्वप्न को और प्रखर बना देता है
सादगी घनी होती जाती है
विचारों के जंगल मे
विचार तो बस दौड़ते है न थकने वाले फुटपाथ की तरह