Friday, October 30, 2009

चाहा था विचारों को बाँध सीमा मे
बंधक बना ले अपना
किंतु यह तो लगता है
अब निरर्थक सपना
सपने तो यादों की कच्ची
डोर से बंधे होते हैं
अचानक किसी स्पर्श से ..
बिखर जाते हैं

बिखरना तो जिंदगी की रीत है
और इसीलिए तो हमने भी
बिखराई प्रीत है
प्रीत एक सांचा है
प्रेम एक ढांचा है
यादों का चैतन्य ,
भावनाओं का समर्पण है

समर्पण मे छुपा अनुराग है
अनुराग ही तो स्नेह है
स्नेह का रूप ममता है
ममता के आगे सब बेबस हें


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