Business Of Pleasure and Pain
Sunday, October 11, 2009
ये शाम बिताती है
बढ़ता अँधेरा
तनहाइयों की लकीरें और चौडी कर देता है
बढ़ता अँधेरा
स्वप्न को और प्रखर बना देता है
सादगी घनी होती जाती है
विचारों के जंगल मे
विचार तो बस दौड़ते है न थकने वाले फुटपाथ की तरह
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