Thursday, December 12, 2013

फूलों ने फिर एक बार माली को ललकारा है ,
जरा ठहरो इन खुशबुओं पे हक़ हमारा है

दीवानों के रतजगों में बैटन चार्ज कि लीलाएँ ,
सर्द शरीरों पे कपड़ो कि भी सीमायें ,

चिंगारियां जल उठी हैं ये भी याद रहे ,
जब  झुलसेगा दामन तब कोई फ़रियाद न रहे ,

लगा लो लाख पहरे ये कारवां फिर भी जुटेगा ,
इन रातों से ही सुबह क सूरज उगेगा। 

Tuesday, February 5, 2013

पहरे में पानी
ना राशन में चीनी
लूट कर फकीरों को
उचक्कों के दिलासे
इस बार के मेले में
फिर बटेंगे सिक्के
फिर कसमे लेंगे
कुछ संविधान पर
तो कुछ मजहब के नाम पर
बेच कर जमीं और जमीर
आराम फ़र्मा रहें हैं अमिर
कहते हैं ...
नयी सहर होने वाली है