Thursday, December 12, 2013

फूलों ने फिर एक बार माली को ललकारा है ,
जरा ठहरो इन खुशबुओं पे हक़ हमारा है

दीवानों के रतजगों में बैटन चार्ज कि लीलाएँ ,
सर्द शरीरों पे कपड़ो कि भी सीमायें ,

चिंगारियां जल उठी हैं ये भी याद रहे ,
जब  झुलसेगा दामन तब कोई फ़रियाद न रहे ,

लगा लो लाख पहरे ये कारवां फिर भी जुटेगा ,
इन रातों से ही सुबह क सूरज उगेगा। 

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