फूलों ने फिर एक बार माली को ललकारा है ,
जरा ठहरो इन खुशबुओं पे हक़ हमारा है
दीवानों के रतजगों में बैटन चार्ज कि लीलाएँ ,
सर्द शरीरों पे कपड़ो कि भी सीमायें ,
चिंगारियां जल उठी हैं ये भी याद रहे ,
जब झुलसेगा दामन तब कोई फ़रियाद न रहे ,
लगा लो लाख पहरे ये कारवां फिर भी जुटेगा ,
इन रातों से ही सुबह क सूरज उगेगा।
जरा ठहरो इन खुशबुओं पे हक़ हमारा है
दीवानों के रतजगों में बैटन चार्ज कि लीलाएँ ,
सर्द शरीरों पे कपड़ो कि भी सीमायें ,
चिंगारियां जल उठी हैं ये भी याद रहे ,
जब झुलसेगा दामन तब कोई फ़रियाद न रहे ,
लगा लो लाख पहरे ये कारवां फिर भी जुटेगा ,
इन रातों से ही सुबह क सूरज उगेगा।
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