Friday, September 25, 2020

 

समजावुनी व्यथेला
मी रोज साद देतो
आकाश वेदनेचे
माळून रोज घेतो  

दुःखात वेदनेच्या
मी भंगल्या स्वरांनी  
बांधून चाळ पायी
आपुलाच वेध घेतो

कितीदा आवाज द्यावा
कितीदा पुन्हा पाहावे
ही भयाण रात्र पुन्हा
न्याहाळीत झोपी जावे 

मी मोजका मुशाफिर
केंव्हा मला न कळले
ह्या वाटेवरी मुशाफिर
परतून नाही आले

हा हुंदका कशाला
हा गलबला नको रे
गलबत वारूंवरचे
वाऱ्यासवे बुडाले

Tuesday, February 9, 2016

अपना रंज ओ ग़म से कुछ देर तो किनारा कर लो
हैं दुनिया में कुछ और मरहले बाकी

डूबती साँसों से कुछ देर तो किनारा कर लो
हैं दुनिया में कुछ और समंदर बाकी

अपनी रेशमी गुफ्तगू के सिलवटों से तो बाहर निकलो
की मेरे खुरदरे लफ़्ज़ों में अभी सुखन है बाकी

Monday, July 28, 2014

फिर आयी रात अँधेरे की चादर ओढ़े
फिर से डाले हैं तेरी यादों के झूले हमने

फिर आयी रात...

तेरी यादों के समुन्दर में डूबे उभरे
पार करते रहे समुन्दर गहरे

फिर आयी रात.....
सहते रहे दर्द ए जुदाई फिर भी
तेरी यादों का दामन ना छूटा


फिर आयी रात.....

रूठना, रूठके मनाने की कोशिश करना
अब यहि काम है अंजाम की कोशिश करना

फिर आयी रात.... 

Thursday, December 12, 2013

फूलों ने फिर एक बार माली को ललकारा है ,
जरा ठहरो इन खुशबुओं पे हक़ हमारा है

दीवानों के रतजगों में बैटन चार्ज कि लीलाएँ ,
सर्द शरीरों पे कपड़ो कि भी सीमायें ,

चिंगारियां जल उठी हैं ये भी याद रहे ,
जब  झुलसेगा दामन तब कोई फ़रियाद न रहे ,

लगा लो लाख पहरे ये कारवां फिर भी जुटेगा ,
इन रातों से ही सुबह क सूरज उगेगा। 

Tuesday, February 5, 2013

पहरे में पानी
ना राशन में चीनी
लूट कर फकीरों को
उचक्कों के दिलासे
इस बार के मेले में
फिर बटेंगे सिक्के
फिर कसमे लेंगे
कुछ संविधान पर
तो कुछ मजहब के नाम पर
बेच कर जमीं और जमीर
आराम फ़र्मा रहें हैं अमिर
कहते हैं ...
नयी सहर होने वाली है

Friday, August 10, 2012


Houslo ke fix deposit se faislo ka EMI bhar rahe hain ,
Dil me liye masihayi tapati dhup me jal rahe hain,

Ehteram to jaruri hai - ek chhaon bhi ,
Munsif bhi intezzar me hain aur gunah bhi .
अब तो रातों में भी आहट से  चौंक जाता हूं  !
अन्ना , अरविन्द  नाम से बौखला जाता हूँ !!
फिर सोचने लगता हूँ अपनी ही धुन में..
सिंह होकर भी कहाँ सियारों में फंस गया ?
बापू  नाम मक्कारी से लेने वालों में बस गया :(
था मै गुरु - ग्यानी अब बस "मुकादम" हूँ,
गाता भी हूँ  भैरव तो बस भैरवी सी लगती है ,
पता नहीं क्या चीज़ गले में आकर अटकती है ?

07/08/2012