Saturday, December 12, 2009


पेड़ नंगे नोकदार


और न लताओं के हार


पक्षी आसमा के उस पार


धुन्द्लाता नभ बेशुमार


सर्द हवा असरदार


बेखबर युवा - धुंए के गुबार


बुजुर्ग चौकन्ने - मंद गतीदार


आई है शीत ऋतू जिसके जाना है पार......





Thursday, December 10, 2009

न है दुआओं मे
न दवाओं मे
जो असर तेरी नजर मे tha
वोही दवा मेरे असर को है

Medicines will not cure
Prayers will not heal
A spell cast by the eyes;
the panacea of Greeks



Friday, October 30, 2009

चाहा था विचारों को बाँध सीमा मे
बंधक बना ले अपना
किंतु यह तो लगता है
अब निरर्थक सपना
सपने तो यादों की कच्ची
डोर से बंधे होते हैं
अचानक किसी स्पर्श से ..
बिखर जाते हैं

बिखरना तो जिंदगी की रीत है
और इसीलिए तो हमने भी
बिखराई प्रीत है
प्रीत एक सांचा है
प्रेम एक ढांचा है
यादों का चैतन्य ,
भावनाओं का समर्पण है

समर्पण मे छुपा अनुराग है
अनुराग ही तो स्नेह है
स्नेह का रूप ममता है
ममता के आगे सब बेबस हें


दीपो के त्यौहार मे हर्ष अपरंपार हो
मिठाई के स्वाद साथ प्रेम , मित्र , परिवार हो
फूलोंकी महक से घर आँगन सराबोर हो
मंगल कामना विश्व कल्याण से ह्रदय आत्मविभोर हो
मिले सफलता हर कार्य मे यही आत्मबल हो
मिटे अँधेरा ,अंहकार , मद यही मंगलाचरण हो
एक दिया ह्रदय मे भी निरपेक्ष भक्ति का प्रकाशित हो
मांगे यहीं हम , हर पल खुशी आपकी वृद्धिंगत हो

-शैलेश
१७/१०/२००९

Sunday, October 11, 2009

ये शाम बिताती है
बढ़ता अँधेरा
तनहाइयों की लकीरें और चौडी कर देता है
बढ़ता अँधेरा
स्वप्न को और प्रखर बना देता है
सादगी घनी होती जाती है
विचारों के जंगल मे
विचार तो बस दौड़ते है न थकने वाले फुटपाथ की तरह

Sunday, August 23, 2009

Bharam and Waada


"Bharam"

'Intezzar to ab apni aadat me shumaar hai
Ham par to chhaya bharose ka khumar hai
Ye bharam na tute to accha hai
Kyonki yaadon ka gharonda abhi kaccha hai. '



"waada"

'Is dil ki baaton me na aana ye to bahek jaata hai aawaron ki taraha
Is sham ke rang pe na jaana ise to hai raat ke rang me mil jaana
Wade karna to hai fitrat juban ki ise har subaha to hai fir fisal jaana .'

Thursday, July 23, 2009

भटकते रहो दर बदर अब

भटकते रहो दर बदर अब
यंही सजा है तुम्हारी
नींद के भी होश है बेखबर
यंही सजा है तुम्हारी
दरो के आड़ से देखेंगे सब तुम्हे
हंसी की आड़ से देखेंगे सब तुम्हे
छीन जायेंगे होश तुम्हारे
तब संभालेगा न कोई तुम्हे
भीड़ से अलग चले थे ?
यही अदा है तुम्हारी !
भटकते रहो दर बदर ............................
झुंड से अलग हो क्यूँ ?
भीड़ मे अकेले क्यूँ ?
राह मे नवेले क्यूँ ?
ढर्रे पे चलना ही रीत है हमारी
भटकते रहो दर बदर .............................
रुकी सी हवा मुक्ति जयघोष मे
सुगंध को व्याकुल फूल
भूक से न बिलखते शिशु अब
बस्तियां निर्विकार
स्तब्ध रास्ते
सोयी इच्छाएं आस्ते आस्ते
बलंदी की सोच से शर्माता गिरी
खाई की शरण मे
फिर अतर्क्य कोलाहल
ऊपर चढ़ चले थे ?
राह गलत थी तुम्हारी
भटकते रहो दर बदर .....................
कोलाहल मे डुबो
अपने आप को भूलो
भीड़ मे तुम हो लो
फिर कुछ सजा कम हो तुम्हारी
न भटको तुम इधर उधर
जगह यहाँ है तुम्हारी...........................
२३.०७.२००९
शैलेश पुरोहित
कीएव , उक्रेन