Monday, June 9, 2008

हर मौके को तेरा ही , जैसे इंतज़ार था

हर मौके को तेरा ही , जैसे इंतज़ार था
दील तुमसे मीलने का ही तोः तलबगार था

जैसे रातों को सुबह की आस थी ,
वैसे ही इस दील मे तुमसे मीलने की प्यास थी

दीलवाले तो अक्सर नादानियाँ करते हैं ,
बा होश बेहोशी की बातें करते हैं

तुम ही जानो , तुमहारे वादे ,
हम तो दील की बातों पे अमल करते हैं ।

शैलेश
07062008

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